अद्भुत आस्था! अलोपी देवी शक्तिपीठ में बिना मूर्ति के होती है पूजा, नवरात्रि में उमड़ता है भक्तों का सैलाब Alopi Devi Shakti Peeth Temple

0
अद्भुत आस्था! अलोपी देवी शक्तिपीठ में बिना मूर्ति के होती है पूजा, नवरात्रि में उमड़ता है भक्तों का सैलाब Alopi Devi Shakti Peeth Temple

चैत्र नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है

अलोपी देवी शक्तिपीठ मंदिर: बिना मूर्ति के होती है माता की पूजा, चैत्र नवरात्रि में जुटता है भक्तों का सैलाब Alopi Devi Shakti Peeth Temple प्रयागराज, 14 मार्च (TNT)। सनातन धर्म में चैत्र नवरात्रि का खास महत्व है। हर साल यह त्योहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस साल चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को हो जाएगी। वहीं, नौ दिनों तक चलने वाले इस त्योहार का समापन 27 मार्च को होगा। चैत्र नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के दौरान देशभर के माता के मंदिरों की रौनिक अद्भुत होती है।

मान्यता है कि मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी

Alopi Devi Shakti Peeth Temple देवी के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी तादाद में भीड़ देखी जाती है, जो माता के दर्शन के लिए उनके द्वार पर आते हैं। देश के उन्हीं मंदिरों में से एक यूपी के प्रयागराज के अलोपीबाग इलाके में स्थित ‘अलोपी देवी शक्ति पीठ’ मंदिर है। इस मंदिर की खासियत है कि यहां माता की मूर्ति के बिना उनकी पूजा की जाती है, जो कि अपने आप में एक अद्भुत दृश्य होता है। नवरात्रि के समय अलोपी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी तादाद में भीड़ उमड़ती है।

अलोपी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक

Alopi Devi Shakti Peeth Temple हालांकि, मंदिर में माता की प्रतिमा न होने के कारण यहां नवरात्रि के समय उनका श्रृंगार तो नहीं होता लेकिन विधि के अनुसार पूरे नौ दिन उनके अलग-अलग स्वरूपों का पाठ किया जाता है। इस मंदिर को ‘अलोपी देवी मंदिर,’ ‘मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर,’ और ‘ललिता मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। अलोपी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अदृश्य हो गया था।

बीच में एक कुंड बना हुआ है, जिसके ऊपर चांदी का एक खास झूला

Alopi Devi Shakti Peeth Temple इसलिए इस मंदिर को देवी अलोपशंकरी के नाम से जाना जाता है। मंदिर में देवी का स्वरूप नहीं है, लेकिन प्रांगण के बीच में एक कुंड बना हुआ है, जिसके ऊपर चांदी का एक खास झूला या पालना बना हुआ है, जिसे लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है और उसकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी, इसलिए माता का आशीर्वाद लेने मंदिर में आए भक्त उसी कुंड से जल लेकर उनके पालने पर चढ़ाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। —आईएएनएस डीके/पीएम

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here