28 या 29 मार्च किस दिन मनाई जाएगी संकष्‍टी चतुर्थी, जाने

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चतुर्थी तिथि देवी देवताओं में प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश को समर्पित होती है. संकष्‍टी चतुर्थी की बात करें तो ये हर हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है. इस वर्ष 2024 भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी 28 मार्च, शाम 6 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 29 मार्च की रात 8 बजकर 20 मिनट तक रहेगी. क्‍योंकि संकष्‍ट्री चतुर्थी 2 त‍िथ‍ियों में है, इसलि‍ए ये कन्फयूजन है कि संकष्‍ट्री चतुर्थी का व्र‍त कब रखा जाएगा, 28 मार्च को या 29 मार्च को. ह‍िंदू पंचांग के अनुसार ज‍िस भी तिथ‍ि में सुर्योदय होता है, उसी तिथ‍ि में उत्‍सव या पर्व मनाया जाता है. लेकिन संकष्‍ट्री चतुर्थी सूर्योदय से नहीं बल्‍कि चंद्रोयद से मनाई जाती है. इसल‍िए इस साल संकष्टी चतुर्थी 28 मार्च को ही मनाई जाएगी.

भालचन्द्र संकष्टी का चतुर्थी का व्रत सूर्योदय से लेकर चन्द्रोदय तक रखा जाता है. चन्द्रोदय पर चन्द्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है. 28 मार्च को सूर्योदय 6:15 पर होगा इसी के साथ व्रत भी प्रारम्भ हो जायेगा. रात में चन्द्रोदय 9:28 बजे होगा तब चन्द्र‌मा को अर्घ्य देकर व्रत सम्पूर्ण हो जायेगा.

चंद्रमा न‍िकलने का समय: में चन्द्रोदय 9:28 बजे होगा तब चन्द्र‌मा को अर्घ्य देकर व्रत सम्पूर्ण हो जायेगा.

पूजा के लिए शुभ काल
ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 4:42 से सुबह 5:29 बजे तक

अभिजीत मुहर्त- दोपहर 12:01 से 12:51 बजे तक

अमृत काल मूर्हत- सुबह 8:56 से सुबह 10:42 बजे तक

भालचन्द्र का अर्थ है जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित हो. चन्द्रमा ‌द्वारा गणेश जी के स्वरूप का उपहास किए जाने पर गणेश जी ने उन्हें दे दिया कि तुम कुरूप, किसी के देखने योग्य नहीं रह देवताओं के अनुरोध पर गणेश जीने जाआगे अपने शाप को समित कर द‍िया कि सिर्फ भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रमा अदर्शनीय रहेगें. जबकि प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष चतुर्थी को तुम्हारा मेरे साथ पूजन होगा. तुम मेरे ललाट पर स्थित होगे. इस प्रकार गजानन मस्तक पर चन्द्रमा धारण कर भालचन्द्र बन गए.

Lord Ganeshaभालचन्द्र का अर्थ है जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित हो.
पूजा विधि
ब्रह्म मूर्हत में उठकर शौच आदि से निवृत होकर स्नान करके पवित्र हो जाएं.
सूर्योदय होने घर व्रत का आरम्भ करें.
घर के उत्तर कोण में चौकी पर हरा कपड़ा बिछा कर उस पर गणेश जी की प्रतिमा या चित्त्र स्थापित करें.
जिसका मुख दक्षिण की तरफ हो. प्रतिमा को लाल वस्त्र से ढक दें.
देशी घी का दीपक जलायें, धूप भी जला लें.
गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें.
गणेश जी की पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा करें.
नैवेद्य में मोदक, लड्डू व शहद अवश्य अर्पित करें.
अन्त में मीठा पान अर्पित करें.
अगर आपके काम-काज में या घर में बार-बार विघ्न आ रहे है तो गणेश अथर्वशीर्ष का 108 बार पाठ विशेष फलदायी होगा.
संकल्प लेकर “ॐ गं गणपतयेन मंत्र का 108,1008 या सवालाख जाप विशेष फलदायी होगा.
व्रत में फलाहार और दूध ले सकते हैं.
रात में चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा को पानी दूध के मिश्रण से अध्ये दे इस प्रकार विधि से किया गया व्रत अनुष्ठान सुख, सौभाग्य, समृद्धि को देने वाला है. विघ्नों का विनाश होकर सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है.

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