हवाई यात्रा करते समय क्या आपको विमान में पहुंचने में बहुत समय लगता है. या क्या आपको लगता है कि आपको इसमें और कम समय लगना चाहिए या क्या विमानन कंपनियां आपको देर से हवाई जहाज में पहुंचाती हैं. ऐसे में आपकी एयरलाइन यात्रियों के कैसे विमान में प्रवेश देती है इससे काफी समय बचा सकती है. विशेषज्ञ इसके अलग अलग तरीके भी बताते हैं तो कुछ एयरलाइन इस तरह के तरीके अपना भी रही हैं.
एविएशन एक्सपर्ट जीइनेडाइन का कहना है कि कई कंपनियां वास्तव में अपने तौर तरीकों में बदलाव नहीं करना चाहती हैं जिससे कई यात्रियों को लगता है कि विमान उड़ने से पहले उनका बहुत समय नष्ट होता है. वे कहते हैं कि इस मामले में एक सरल नियम चलता है, “जब तक चीज टूटे नहीं, उसे ठीक मत करो.”
बोर्डिंग प्रक्रिया को बदलने में बहुत सारा समय और कवायद लगती है. कई जगह यात्री विमान कंपनियों के तरीकों का भी विरोध करते हैं. पर फिर भी दुनिया में कई एयरलाइन यात्रियों का समय बचाने के लिए कुछ तरीके अपनाती भी हैं. आइए जानते हैं कि ऐसे कौन से वो तरीके हैं.
यूनिइटेड एयरलाइन्स ने हाल ही में विल्मा (WILMA) सिस्टम अपनाया है, जो कि विंडो-मिडिल- असाइल का छोटा रूप है. इस सिस्टम में यात्रियों को उनकी सीट की स्थिति के मुताबिक विमान में प्रवेश दिया जाता है. इसमें पहले विंडो सीट वाले यात्रियों के अंदर जाने दिया जाता है फिर मिडिल सीट वालों को पिर असाइल सीट वालों को.
गौर करने वाली बात यह है कि अधिकांश एयरलाइन पहले पीछे बैठने वाले यात्रियों को प्रवेश कराते हैं, फिर आगे वाले यात्रियों की बारी आती है. द सन के मुताबिक कई विशेषज्ञों का कहना है कि विल्मा पद्धति से विमान कंपनियां बहुत सारा समय बचा सकती हैं. लेकिन कुछ विशेषज्ञ एक स्टेफन पद्धति की भी सलाह देते हैं. इसमें यात्रियों को एक समूह में, लेकिन विंडो मिडिल और असाइल के ही अनुसार विमान में प्रवेश कराया जाता है.
स्टेफन पद्धति में ऑड नंबर वाले विंडो यात्री पहले जाते हैं फिर ईवन नंबर वाले विंडो यात्री जाते हैं इस तरह से यह पद्धति वेल्मा पद्धति से भी तेज और कारगर हो सकती है. वहीं कुछ कम बजट वाली एयरलाइन फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व वाली पद्धति ही अपनाती हैं. वहीं कुछ कंपनियां यात्रियों के उनके प्रवेश के अनुसार ही सीट चुनने का अवसर देती हैं.


