Baroda By-election result: हाईकमान में बढ़ेगा हुड्डा का कद, उलटफेर नहीं कर पाई मनोहर व दुष्यंत की जोडी

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Baroda By-election result: हाईकमान में बढ़ेगा हुड्डा का कद, उलटफेर नहीं कर पाई मनोहर व दुष्यंत की जोडी

हरियाणा के सोनीपत जिले की बरोदा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे खास चौंकाने वाले नहीं हैं। बरोदा के मतदाताओं के रुझान से पहले से ही लग रहा था कि यहां कांग्रेस चुनाव जीत सकती है। सही मायनों में बरोदा में कांग्रेस नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके राज्यसभा सदस्य बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा की जीत हुई है। समग्र रूप से यह जीत हालांकि कांग्रेस की ही मानी जाएगी, लेकिन पहली बार चुनाव लड़े नए चेहरे इंदु नरवाल को विधानसभा तक पहुंचाने का श्रेय हुड्डा पिता-पुत्रों को जाता है। बरोदा में कांग्रेस की इस जीत से हुड्डा व दीपेंद्र का पार्टी हाईकमान के साथ-साथ जनता में कद बढ़ा है। साथ ही इस जीत के साथ हुड्डा ने खुद को एक बार फिर जाटों का सर्वमान्य नेता भी साबित कर दिया है
पानीपत और रोहतक के बीच बसे बरोदा में कांग्रेस की जीत के खास मायने हैं। जाट बाहुल्य बरोदा हलके में कांग्रेस ने यह जीत उन राजनीतिक परिस्थितियों में हासिल की, जब भाजपा व सरकार में साझीदार उसकी सहयोगी जननायक जनता पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा।

राजनीति के जानकार लोगों को लग रहा था कि भाजपा उम्मीदवार योगेश्वर दत्त को भाजपा के कोटे से गैर जाट और जजपा के कोटे से जाट मतदाताओं का आशीर्वाद मिल सकता है, लेकिन भाजपा को जजपा के वोट बैंक का जरा भी फायदा नहीं हुआ। ऐसे में योगेश्वर दत्त को जितने वोट मिले, वह भाजपा व पहलवान की व्यक्तिगत छवि की देन माने जा सकते हैं।

बरोदा में इंदु नरवाल की जीत कांग्रेस की कम और हुड्डा पिता-पुत्रों की ज्यादा

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90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के 30 विधायक हैं, जो इंदु नरवाल की जीत के बाद बढ़कर 31 हो गए हैं। यह सीट कांग्रेस के ही पास थी। श्रीकृष्ण हुड्डा के देहावसान की वजह से खाली हुई बरोदा सीट पर उपचुनाव हुआ था। कांग्रेस की इस जीत से हालांकि भाजपा-जजपा गठबंधन की सरकार पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ने वाला है, लेकिन भाजपा व उसकी सहयोगी पार्टी जजपा के रणनीतिकारों को अपनी हार से तगड़ा झटका लगा है। भाजपा व जजपा ने भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था तथा विकास के नारे के साथ यह चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस यानी हुड्डा और दीपेंद्र ने बरोदा की अनदेखी तथा तीन कृषि कानूनों को आधार बनाकर चुनावी रण में दस्तक दी थी

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