गीता जीवन में धारण करने योग्य श्रेष्ठ ग्रंथ है-स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज  गुजवि में एनएसएस के राज्यस्तरीय एनएसएस शिविर के समापन समारोह पर अपने उद्बोधन दे रहे थे स्वामी जी

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Photo 1 23.11.2021 NSS scaledगीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा है कि गीता केवल पूजा पाठ की पुस्तक नहीं है, बल्कि जीवन में धारण करने योग्य एक श्रेष्ठ प्रेरणा गं्रथ है। वर्तमान समय में श्रीमद्भगद् गीता की प्रांसांगिकता बहुत अधिक है। विशेषकर भविष्य निर्माण की दहलीज पर खड़े युवाओं के लिए गीता श्रेष्ठ पथप्रदर्शक है। स्वामी ज्ञानानंद जी मंगलवार को विश्वविद्यालय एनएसएस ईकाई के सौजन्य से आयोजित किए गए राज्य स्तरीय एनएसएस शिविर के समापन समारोह में स्वयंसवेकों को संबोधित कर रहे थे। एनएसएस इकाई एवं विश्वविद्यालय के धार्मिक अध्ययन संस्थान के सौजन्य से चै. रणबीर सिंह सभागार में हुए इस समारोह में विश्विद्यालय के कुलसचिव अवनीश वर्मा, धार्मिक अध्ययन संस्थान के अधिष्ठाता प्रो. किशना राम, एनएसएस इकाई के संयोजक डा. अनिल भानखड़, डा. अंजू गुप्ता व मोहित वर्मा भी मंच पर उपस्थित रहे। संचालन डा. गीतू धवन ने किया।Photo 3 23.11.2021 NSS scaled
स्वामी जी ने अपने संबोधन में कहा कि युवा तीन शब्दों को अपने जीवन धारण करके आगे बढ़ेगे तो वे हर इच्छित सफलता को पा लेंगे। ये शब्द हैं- एक्टिव, अर्लट तथा अवेरनैस। गीता के तीनों योग कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग भी इन्हीं शब्दों का संदेश देते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि मानव स्वयं ही स्वयं का शत्रु भी है और मित्र भी। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि अपने भीतर का विवेकानंद जागृत करें तथा जीवन का हर कार्य व्यवस्थित रहकर करें। ना ही किसी कार्य में अधिकता और ना किसी कार्य में कमी उचित है। धैर्य जरुरी है, लेकिन उत्साह भी बना रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर कार्य जीवन मूल्यांे पर भी आधारित होना चाहिए। उन्होंने भगवद्गीता को विपरित परिस्थितियों में मानव का मार्गदर्शन करने वाला ग्रंथ बताया। उन्होंने कहा कि गीता को जीवन में धारण करने से जीवन में इच्छा शक्ति, धैर्य, आत्मविश्वास तथा सहन शक्ति में वृद्धि होती है। Photo 2 23.11.2021 NSS scaled
उन्होंने कहा कि ऊर्जा को सकरात्मक दिशा मंे लगाएं। असफलताओं के बारे में सोचकर परेशान ना हों। असफलता भी जीवन में अनुभव देती है और अनुभव सफलता की सीढ़ी बनते हैं। उन्हांेने कहा कि पद, प्राप्ति और प्रतिष्ठा की प्रति आशक्ति की बजाय कर्म से आशक्ति रखें। व्यक्ति जीवन में जैसा चिंतन करता है उसका वैसा ही व्यक्तित्व बन जाता है। उन्होंने कहा कि अच्छाई पर दृढ रहें। बुराई के साथ ना लगें।
स्वामी जी ने अपने संबोधन के बाद स्वयंसेवकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिए। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि ज्ञान केवल जानकारी नहीं है, बल्कि जीवन को सजग करना है। उन्होंने ध्यान को सर्वाेच्च सत्ता से सीधे जुड़ने का मार्ग बताया। उन्हांेने ध्यान के दौरान आने वाली कठिनाइयों से निपटाने के लिए मार्ग भी सुझाए। स्वागत संबोधन अनिल भानखड़ ने दिया।

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