विद्या देवी जिंदल स्कूल, हिसार में प्रथम जिंदल लिटरेचर फेस्टिवल Jindal Literature Festival का भव्य शुभारंभ

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विद्या देवी जिंदल लिटरेचर फेस्टिवल

http://विद्या देवी जिंदल स्कूल, हिसार में प्रथम जिंदल लिटरेचर फेस्टिवल Jindal Literature Festival का भव्य शुभारंभ विद्या देवी जिंदल स्कूल, हिसार मे प्रथम-जिंदल लिटरेचर फेस्टिवल का भव्य शुभारंभ

विद्या देवी जिंदल स्कूल, हिसार में 21 से 23 नवंबर 2025 तक आयोजित त्रि-दिवसीय प्रथम जिंदल साहित्य महोत्सव का शुभारंभ एक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उल्लास के वातावरण में हुआ। उद्घाटन समारोह में देश के सुविख्यात साहित्यकार और कला-जगत की प्रतिष्ठित विभूतियाँ— श्री पुष्पेश पंत, सुश्री तराना हुसैन खान, संगीता गुप्ता, अनिता मानी, सुदीप सेन तथा जिंदल स्टेनलेस हिसार के वाइस-प्रेसिडेंट श्री बिंदलिश जी, एच.आर. हेड श्री प्रह्लाद चौधरी जी, ओ.पी. जिंदल मॉडर्न स्कूल की प्रधानाचार्या सुश्री नंदिता साहू, जिंदल साहित्य महोत्सव के निदेशक श्री अमिताभ सिंह बघेल, विद्यालय की प्रधानाचार्या एवं इस कार्यक्रम की सलाहकार श्रीमती नैना ढिल्लन एवं प्रशासक श्री निखिल रुद्रा की गरिमामयी उपस्थिति रही।

दीप प्रज्ज्वलन के साथ आरंभ हुए इस समारोह में विद्यालय की छात्राओं ने राग अहीर भैरव में सुमधुर सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को साहित्यिक और सांस्कृतिक सुरभि से भर दिया।

प्रधानाचार्या एवं फेस्टिवल सलाहकार का संदेश

प्रधानाचार्या श्रीमती नैना ढिल्लन ने सभी अतिथियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि विद्यालय के संस्थापक स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश जिंदल का सपना था कि यहाँ अध्ययनरत छात्राओं को विश्व-स्तरीय सुविधाएँ प्राप्त हों, और आज यह सपना साकार रूप ले चुका है। उन्होंने बताया कि विद्यालय की निदेशिका श्रीमती दीपिका जिंदल का भी यह दृढ़ विश्वास था कि साहित्यिक संस्कृति को सुदृढ़ करने हेतु एक भव्य साहित्य महोत्सव का आयोजन किया जाए, जिससे छात्राओं में पठन-पाठन, चिंतन-मनन और लेखन के प्रति स्वाभाविक रुचि का विकास हो।

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उन्होंने यह भी कहा कि यह उत्सव न केवल हिसार बल्कि संपूर्ण हरियाणा में आयोजित पहला साहित्य महोत्सव है। पुस्तकें—जो आत्मा को प्रकाशित करती हैं, विचारों को धार देती हैं और मानवीय संवेदनाओं को विस्तृत करती हैं—वास्तव में हमारी विकास-यात्रा की साक्षी हैं और समाज को जोड़ने वाली अदृश्य किन्तु सशक्त कड़ी भी।

इस त्रिदिवसीय आयोजन में विविध कार्यशालाएँ, संवाद-सत्र, साहित्यिक वार्ताएँ, लेखक-पाठक संवाद, काव्य-पाठ तथा अनेक प्रतियोगिताएँआयोजित की जाएँगी, जो विद्यार्थियों को सृजनात्मकता के नए क्षितिजों से परिचित कराएँगी।

फेस्टिवल निदेशक का संदेश

साहित्य महोत्सव के निदेशक श्री अमिताभ सिंह बघेल ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य उनके लिए केवल विषय नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है, इसलिए इस महोत्सव को मूर्त रूप देने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपना उनके लिए अत्यंत सम्मान का विषय है। उन्होंने कहा कि आज यह कहना कि लोगों में पढ़ने की आदत कम हो रही है—एक भ्रम है। लेखकों, कवियों और प्रकाशकों की बढ़ती संख्या इस तथ्य का प्रमाण है कि पाठक-समुदाय निरंतर विस्तृत हो रहा है और साहित्य आज भी जनमानस की धड़कन बना हुआ है।

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उद्घाटन के बाद कविता-पाठ सत्र ने माहौल को संवेदनाओं से भर दिया। विभिन्न कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानवीय भावनाओं, सामाजिक प्रश्नों और कल्पना की दुनिया को जीवंत कर दिया। इसके पश्चात प्रस्तुति “From The Royal Kitchens” रॉयल किचन से ने दर्शकों को शाही रसोई की परंपराओं और इतिहास के स्वादिष्ट सफ़र पर ले जाकर चकित कर दिया। “Be A Neighbourhood Naturalist” पड़ोस के प्रकृतिवादी बनें कार्यशाला में प्रतिभागियों को अपने आसपास की प्राकृतिक विविधता को समझने, पहचानने और संरक्षित करने की प्रेरणा मिली। विशेषज्ञों ने सरल और रोचक उदाहरणों के माध्यम से प्रकृति-पर्यवेक्षण की महत्ता समझाई। “Nature of Poetry” कविता की प्रकृति- सत्र ने कविता की संरचना, उसकी भाषा और संवेदना पर सार्थक बातचीत का अवसर दिया।

इसी क्रम में “Sigma Woman” में आधुनिक महिला की पहचान, स्वतंत्रता और सामाजिक भूमिका पर प्रेरक संवाद हुआ। टॉक शो “Roti Kapda Vaghairā” रोटी कपड़ा वग़ैरह ने रोज़मर्रा की जरूरतों, सामाजिक विषमताओं और बदलते शहरी जीवन के पहलुओं पर गंभीर किंतु सहज चर्चा प्रस्तुत की। इसके बाद “Krishna Circus” कृष्णा सर्कस ने कृष्ण की लीलाओं को कलात्मक ढंग से मंचित कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। “Bed of Arrows” बाणों का बिस्तर ने महाभारत के भीष्म पितामह के प्रसंगों को दार्शनिक और भावनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं को चिंतन में डुबो दिया। “Wild About India” भारत के दीवाने सत्र ने भारतीय वन्यजीवन, जैव विविधता और संरक्षण के प्रयासों पर विस्तृत जानकारी और प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किए। पर्यावरण प्रेमियों ने इसे बेहद सराहा। साहित्यिक सत्र “ज़िंदगी से डरते हो” ने जीवन, संघर्ष और आत्म-मंथन से भरी रचनाओं को केंद्र में रखा, जिससे दर्शकों में आत्मचिंतन का वातावरण बना।

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