देवेन वर्मा: हंसी का वह सजीव चेहरा जो आज भी यादों में जिंदा है

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हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी कॉमेडी की बात की जाएगी, देवेन वर्मा का नाम उन चंद कलाकारों में शुमार किया जाएगा जिन्होंने हंसी को एक नया आयाम दिया। वह उन कलाकारों में से थे जो न केवल कॉमेडी में माहिर थे, बल्कि एक बेहद संजीदा और सजीव अभिनेता भी थे। पर्दे पर उनकी मौजूदगी न केवल दर्शकों को हंसाने के लिए होती थी, बल्कि वह हर किरदार को ऐसा जीवंत कर देते थे कि उनकी अदाकारी लोगों के दिलों में घर कर जाती थी। लेकिन देवेन वर्मा की कहानी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनका सफर अपने आप में एक प्रेरणा है।

देवेन वर्मा: हंसी का वह सजीव चेहरा जो आज भी यादों में जिंदा है
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स्टेज से सिनेमा तक का सफर

देवेन वर्मा का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत स्टेज शो से की थी। स्टेज पर उनकी अदाकारी ने जल्दी ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया। एक बार ऐसे ही एक स्टेज शो के दौरान मशहूर फिल्मकार बी.आर. चोपड़ा ने उन्हें देखा और तुरंत अपनी फिल्म धर्मपुत्र (1961) के लिए साइन कर लिया। इस फिल्म के लिए उन्हें 600 रुपये की फीस मिली थी, जो उस समय के हिसाब से एक अच्छी शुरुआत थी। धर्मपुत्र में उनकी अदाकारी ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एक पहचान दिलाई, और इसके बाद उनके करियर का सफर रुकने का नाम नहीं लिया।

कॉमेडी की मर्यादा का पालन

देवेन वर्मा की खासियत यह थी कि वह कॉमेडी में कभी भी अपनी सीमाओं को नहीं लांघते थे। उनके अनुसार, कॉमेडी का काम हंसाना जरूर है, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि अभिनेता को खुद से नज़रें चुरानी पड़ें। उनकी यह सोच उनकी अदाकारी में झलकती थी। चाहे वह अंगूर (1982) हो, जिसमें उन्होंने एक बेहद मजेदार और भ्रमित किरदार निभाया, या फिर गोलमाल (1979) में उनकी शानदार उपस्थिति, देवेन वर्मा की कॉमेडी हमेशा मर्यादित और शालीन रही।

उनकी फिल्में जैसे खट्टा मीठा, चोरी मेरा काम, कोरा कागज, और नास्तिक ने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। वह हंसी के उन कलाकारों में से थे, जो न केवल लोगों को गुदगुदाते थे बल्कि उनके दिलों को छू जाते थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि वह हंसी के माध्यम से जख्मों पर मरहम लगाने का काम करते थे।

रेखा और जितेंद्र के साथ हिट फिल्में

1980 के दशक में देवेन वर्मा ने जुदाई (1980) जैसी बड़ी हिट फिल्मों में काम किया। इस फिल्म में उनके साथ रेखा, जितेंद्र और अशोक कुमार जैसे दिग्गज कलाकार थे। फिल्म में देवेन वर्मा ने एक डॉक्टर का किरदार निभाया, जो दर्शकों को बहुत पसंद आया। उनका यह किरदार एक गंभीर भूमिका थी, लेकिन देवेन वर्मा ने इसे भी अपने अनोखे अंदाज में निभाया। फिल्म की सफलता के बाद वह इंडस्ट्री में कॉमेडी के लिए पहली पसंद बन गए।

रेखा और जितेंद्र के साथ उनकी जोड़ी ने फिल्मों में कई हिट्स दी। जुदाई जैसी फिल्मों में उनकी परफॉर्मेंस को क्रिटिक्स और दर्शकों दोनों ने खूब सराहा। उनके किरदार इतने स्वाभाविक होते थे कि वह हर सीन में छाप छोड़ देते थे, चाहे वह छोटे से छोटा सीन ही क्यों न हो।

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16 फिल्मों का अनुबंध: एक अनोखा रिकॉर्ड

देवेन वर्मा के करियर में एक ऐसा समय भी आया जब वह इंडस्ट्री में बेहद पॉपुलर हो गए थे। एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने एक साथ 16 फिल्में साइन की थीं। यह एक अविश्वसनीय उपलब्धि थी और यह उनकी मांग को दर्शाता था। मेकर्स उन्हें अपनी फिल्मों में लेना चाहते थे, क्योंकि वह जानते थे कि देवेन वर्मा की मौजूदगी से फिल्म को एक अलग ही ऊंचाई मिलती है।

उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि वह कॉमेडी के लिए मेकर्स की पहली पसंद बन गए थे। लेकिन यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि इतनी लोकप्रियता के बावजूद देवेन वर्मा ने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। वह अपने उसूलों के पक्के थे और अपने सिद्धांतों के लिए ही उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से दूरी भी बना ली थी।

अभिनेता और निर्माता: बहुमुखी प्रतिभा के धनी

देवेन वर्मा ने न केवल एक अभिनेता के रूप में काम किया, बल्कि वह एक निर्माता भी थे। उनकी निर्माता के रूप में फिल्मों की सूची में भी कुछ उल्लेखनीय नाम शामिल हैं। अंगूर (1982) जैसी फिल्में, जिन्हें आज भी क्लासिक कॉमेडी फिल्मों में गिना जाता है, उनके प्रोडक्शन के तहत आई थीं। वह हमेशा क्वालिटी को प्राथमिकता देते थे और उनकी फिल्मों में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था।

एक निर्माता के रूप में भी उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि फिल्में न केवल मनोरंजन प्रदान करें, बल्कि उनके भीतर एक संदेश भी छुपा हो। वह सिनेमा को एक माध्यम मानते थे, जिसके जरिए न केवल दर्शकों का मनोरंजन हो, बल्कि उन्हें कुछ सोचने पर भी मजबूर किया जाए।

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हंसी का जादू आज भी बरकरार

देवेन वर्मा आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनकी अदाकारी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो भी काम किया, वह उसकी गहरी छाप छोड़ गए। गोलमाल, अंगूर, खट्टा मीठा और दिल तो पागल है जैसी फिल्मों में उनका काम हमेशा याद किया जाएगा।

उनकी कॉमेडी न केवल लोगों को हंसाने का काम करती थी, बल्कि उसमें एक गहराई भी होती थी। वह कभी भी सस्ती कॉमेडी के रास्ते पर नहीं चले और यही वजह है कि उनकी कॉमेडी आज भी उतनी ही ताजा और महत्वपूर्ण लगती है। वह उन चुनिंदा कलाकारों में से थे, जिन्होंने अपने उसूलों पर चलते हुए इंडस्ट्री में एक खास मुकाम हासिल किया।

देवेन वर्मा का नाम हिंदी सिनेमा के उन चंद कलाकारों में शुमार है, जिन्होंने अपनी कॉमेडी और अदाकारी से सिनेमा को एक नई दिशा दी। वह न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी थे। उनकी फिल्मों में उनके उसूल और सिद्धांत झलकते थे और वह कभी भी दर्शकों की अपेक्षाओं से समझौता नहीं करते थे।

आज भी उनकी फिल्मों को देखकर हम महसूस कर सकते हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई पहलुओं को दर्शाने और समझने का एक जरिया भी है। देवेन वर्मा इस बात का जीता-जागता उदाहरण थे कि सिनेमा और हंसी के बीच एक गहरा और संवेदनशील रिश्ता होता है।

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