जिंदल साहित्य महोत्सव 2025 के तीसरे और अंतिम दिन का समापन विचारों, चिंतन, प्रस्तुतियों और
सांस्कृतिक आभा के असाधारण मेल के साथ हुआ। इसने हरियाणा के प्रथम प्रमुख साहित्य उत्सव के
उद्घाटन संस्करण को यादगार और ऐतिहासिक बना दिया।

महोत्सव का समापन प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता मुफ़्फ़र अली के मनभावन सत्र के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने
अपनी कालजयी कृति ‘उमराव जान’ के माध्यम से दर्शकों को स्मृतियों की दुनिया में ले गए। इसके बाद
विद्या शाह की मंत्रमुग्ध करने वाली सूफ़ियाना प्रस्तुति “रंग सूफ़ियाना” ने सभी को मोहित कर दिया।
उनकी गायकी और सुरों की गूंज ने पूरे सभागार में एक अद्भुत अनुभूति पैदा की और उत्सव को एक
जादुई समापन प्रदान किया।

विद्या देवी जिंदल स्कूल, हिसार में 21 से 23 नवंबर 2025 तक आयोजित त्रि-दिवसीय प्रथम जिंदल साहित्य
महोत्सव के अंतिम दिन का शुभारंभ विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सामूहिक कथक नृत्य ‘तराना’ से हुआ। इस
कार्यक्रम ने दर्शकों को प्रभावित कर दिया। आज के प्रथम सत्र में ख्यात लेखिका प्रत्यक्षा की नई पुस्तक ‘शीशा घर’
का विमोचन के साथ हुआ। समापन समारोह में यह वादा किया कि यह महोत्सव आने वाले वर्षों में और व्यापक
पैमाने के साथ होगा जो और अधिक भव्यता लिए होगा।
बियॉन्ड द लास्ट पोस्ट(Beyond The Last Post) गीतिका लिड्डर के साथ श्रीमती नैना ढिल्लन की हुई वार्ता में
उन्होंने बताया कि उनके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनके पति, ब्रिगेडियर लखबिंदर सिंह “टोनी”
लिड्डर, 8 दिसंबर 2021 को तमिलनाडु के कुन्नूर में हुए हेलिकॉप्टर दुर्घटना में शहीद हो गए। इस गहन व्यक्तिगत
त्रासदी के बाद गीतिका ने अपने दर्द, यादों और संघर्ष को शब्द देने का साहसिक निर्णय लिया, जो आगे चलकर
उनकी पहली पुस्तक “I Am a Soldier’s Wife” ‘मैं सैनिक की पत्नी’ के रूप में सामने आया। यह पुस्तक सिर्फ एक
सैनिक की पत्नी के जीवन का वर्णन नहीं है, बल्कि प्यार, कर्तव्य, इंतज़ार, असुरक्षा और एक असहनीय खोने की
पीड़ा का सच्चा, ईमानदार और गहराई तक छू लेने वाला संस्मरण है। उन्होंने वार्ता में बताया है कि कैसे एक सैनिक
की पत्नी हर विदाई को अंतिम होने की आशंका के साथ जीती है, और कैसे अचानक दुनिया बदल जाने के बाद भी
इंसान खुद को संभालने, अपने परिवार को थामने और आगे बढ़ने की कोशिश करता है। उन्होंने माना कि अपने
लेखन के माध्यम से यह दिखाती हैं कि शोक केवल एक दर्द नहीं, बल्कि एक यात्रा है—टूटने से दोबारा बन जाने की,
अंधेरे से रोशनी की।

Sargam- Pratyush Gupta श्री प्रत्युष गुप्ता द्वारा एक संगीत सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में उन्होंने छात्रों
को सात स्वरों (सा, रे, गा, मा, प, ध, नी) के इतिहास और व्युत्पत्ति के बारे में बताया तथा महान
संगीतज्ञ तानसेन के जीवन और योगदान पर चर्चा की। छात्रों की सहभागिता बढ़ाने के लिए उन्होंने कई सक्रिय
गतिविधियाँ करवाईं, जिनमें स्वर पहचान और ताल अभ्यास शामिल थे। सत्र अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक रहा,
जिससे छात्रों की संगीत में रुचि और समझ दोनों बढ़ी।
ये आदतें जलद की – चंद्रशेखर वर्मा -अमिताभ सिंह बघेल
एक विशेष वार्ता में प्रसिद्ध हिंदी और उर्दू कवि तथा लेखक चंद्रशेखर वर्मा ने साहित्यकार अमिताभ सिंह बघैल के
साथ मिलकर अपने रचनात्मक अनुभव और साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। चंद्रशेखर वर्मा, जो मनोविज्ञान में
मास्टर डिग्रीधारी और प्रसिद्ध लेखक भगवतीचरण वर्मा के पोते हैं और धीरेंद्र वर्मा के बेटे हैं, ने अपने साहित्यिक
सफर और ग़ज़लों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपनी ग़ज़लें और कविताएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें “घट रही है रोज
मेरी छहरगी”जैसी रचनाएँ शामिल हैं।कार्यशाला में दोनों साहित्यकारों ने कविता और ग़ज़ल की रचनात्मक प्रक्रिया,
व्यक्तिगत दृष्टिकोण और आधुनिक साहित्य में उनकी भूमिका पर विचार साझा किए। उपस्थित श्रोताओं ने साहित्य
के भावनात्मक और बौद्धिक पहलुओं को समझने का अवसर प्राप्त किया। चंद्रशेखर वर्मा का योगदान आधुनिक हिंदी
और उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है, और उनकी रचनाएँ लगातार साहित्यिक मंचों पर सराही जाती हैं।
‘शीशा घर’- लेखिका प्रत्यक्षा की नई किताब ‘शीशा घर’ के विमोचन के उपरांत सुश्री ऋचा रुद्रा के साथ हुई वार्ता में
लेखिका प्रत्यक्षा ने बताया कि आज लेखन शैली में कुछ अलग और रोमांचक कथा पाठकों को प्रभावित करती है।
लेखन में कुछ ऐसा होना चाहिए जो पाठकों को पढ़ने के लिए हमेशा विवश करे। मेरी कोशिश होती है कि जब मन में
कुछ विचार आए तब लिख देना चाहिए। मेरी कहानियाँ बहुत लंबी नहीं होती हैं। मेरे लिखने का तरीका अलग है। जो
विचार आए उसे पहली बार में ही लिख देती हूँ बाद में मेरे पास न तो समय और न ही विचार होते हैं कि उसमें कोई
सुधार करूँ। लेखिका ने उपस्थित श्रोताओं को कुछ लेखन करने के लिए प्रेरित किया।
नालंदा-(Nalanda)Abhay – Chhavi Rajawat
साहित्य महाकुंभ में आओयित ज्ञानवर्धक वार्ता में प्रख्यात लेखक व कवि श्री अभय कुमार तथा सुश्री छवि
राजावत मुख्य वक्ता रहे। श्री अभय ने अपनी पुस्तक ‘नालंदा’ के माध्यम से ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय की
महत्ता पर प्रकाश डाला, जिसे विश्व की महान धरोहरों में गिना जाता है। उन्होंने बताया कि यह विश्वविद्यालय
नागार्जुन तथा चीन के दार्शनिक ह्वेनसांग जैसे विद्वानों को आकर्षित करता था, और ह्वेनसांग के वर्णनों से ही हमें
नालंदा के इतिहास का विस्तृत ज्ञान मिलता है। उन्होंने यह भी बताया कि ‘नालंदा’ नाम एक ऐसे नाग की कथा से
जुड़ा है, जो कमल-पुष्पों से भरे सरोवर में निवास करता था। यह वार्ता विद्यार्थियों के लिए अत्यंत रोचक और
प्रेरणादायी रही।
The Art of Being Seen-Geetarsh Kaur- Payal Talwar सुश्री गीतार्श कौर, जो कि एक इमेज कंसल्टेंट और द
स्किल स्कूल की संस्थापक हैं, के साथ पायल तलवार द्वारा एक वार्ता आयोजित की गई। इस कार्यशाला का विषय
महिलाओं के लिए अपनी पहचान बनाए रखना था। गीतार्श कौर ने बताया कि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेषता
होती है, जो उसे अलग बनाती है, और हमें इसे पहचान कर लगातार विकसित करना चाहिए। उन्होंने महिलाओं को
यह सन्देश दिया कि अपनी पहचान को समझो, दूसरों की टिप्पणियों से असुरक्षित महसूस न करें, और खुद को
अपनी आँखों से जानो। उन्होंने जोर देकर कहा कि दूसरों के विचारों के पीछे न भागें, बल्कि स्वयं की समझ और
विश्वास पर ध्यान दें। कार्यशाला में छात्रों ने सक्रिय भागीदारी दिखाई और इसे प्रेरणादायक अनुभव बताया।
एक अनकही कारगिल कहानी (The Untold Kargil Story- Lakhwinder Singh) मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने
अपनी ज़िंदगी के 40 साल से अधिक भारतीय सेना को सौंप दिए। उन्होंने 1971 एवं 1999 के युद्ध में पाकिस्तानी
सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। मेजर ईशा के साथ आज हुई वार्ता में उन्होंने अपनी पुस्तक Artillery’s Thunder: The
Untold Kargil Story में कारगिल युद्ध (1999) के दौरान भारतीय सेना की रणनीति और युद्ध की वास्तविक
परिस्थितियों से श्रोताओं को अवगत करवाया। उनका मानना है कि कारगिल युद्ध में आर्टिलरी (तोपखाने) का
योगदान निर्णायक था और इसे केवल सहायक शक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने अपनी ब्रिगेड के
नेतृत्व में 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेडका अनुभव साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार आर्टिलरी ने भारतीय सैनिकों
की सफलता में केंद्रीय भूमिका निभाई। उनका विचार है कि युद्ध की शुरुआत में पाकिस्तान की घुसपैठ को गंभीरता
से नहीं लिया गया था, जिससे भारत की स्थिति कमजोर हो गई थी। इस खुफिया और योजना संबंधी कमी को
उन्होंने युद्ध के शुरुआती कठिन दौर का प्रमुख कारण बताया है। उन्होंने बताया कि उनके नेतृत्व में इस्तेमाल किए
गए 155 मिमी बोफोर्स हॉवित्ज़र और लगभग 100 तोपों की समन्वित कार्यप्रणाली ने युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई। उन्होंने आर्टिलरी की डायरेक्ट फायर तकनीक का इस्तेमाल किया, जो उस समय असामान्य था और जिसने
दुश्मन सैनिकों में नैतिक गिरावट पैदा की। उनके अनुसार, लगभग 2,90,000 गोले दागे गए, और यह लगातार और
सटीक आर्टिलरी फायरिंग युद्ध के परिणाम को बदलने में निर्णायक साबित हुई। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि
कारगिल युद्ध के अनुभव आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
Pressing Boundaries – Chandra Mohan” लेखक चंद्रमोहन और उनकी बेटी ज्योत्स्ना मोहन ने रेवा रुद्रा के
साथ हुई वार्ता में बताया कि “प्रताप: ए डिफ़ायंट न्यूज़पेपर” यह पुस्तक भारत के प्रतिष्ठित उर्दू और हिंदी
अख़बार प्रताप के इतिहास और इसके साहसिक पत्रकारिता योगदान को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में
दिखाया गया है कि कैसे प्रताप ने उपनिवेशी शासन, राजनीतिक हिंसा और आपातकाल जैसी परिस्थितियों में स्वतंत्र
और जिम्मेदार पत्रकारिता की, और जनता के अधिकारों की आवाज़ उठाई। चंद्रमोहन इस अख़बार परिवार के सदस्य
होने के कारण इसमें अंदरूनी दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जबकि ज्योत्स्ना मोहन अपनी पत्रकारिता के अनुभव से
ऐतिहासिक और आधुनिक प्रासंगिकता जोड़ती हैं। पुस्तक न केवल परिवार और अख़बार की कहानी बताती है, बल्कि
उर्दू भाषा के महत्व, भारतीय सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की भूमिका को भी रेखांकित
करती है। यह किताब साहसी पत्रकारिता, प्रेस की स्वतंत्रता और भारत के पत्रकारिता इतिहास के प्रति जागरूकता
बढ़ाने वाली है।
“उमराव जान” – प्रख्यात फ़िल्म निर्माता, कवि एवं चित्रकार मुज़फ़्फर अली के साथ लेखिका मधुरीता के साथ हुई
वार्ता के अनुसार, “उमराव जान” उनके लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा और उनकी
अपनी यादों का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि एक कलाकार जीवन में कभी हार नहीं मानता। कलाकार का जीवन
दूसरों के लिए प्रेरणा का कार्य करता है। उमराव जान फ़िल्म की रीरिलीज़ उनके लिए एक यादगार पल था। उन्होंने
इस फ़िल्म में लखनऊ/अवध की संस्कृति को बहुत प्रामाणिक रूप से पेश करने की कोशिश की, क्योंकि उनके लिए
वह अपनी ज़मीनजड़ों की कहानी थी। उन्होंने श्रोताओं से कह कि हमें जीवन में कभी हार नहीं मानना चाहिए।
जितना ज़्यादा संघर्ष होगा उतने ही हम सफल होंगे।
प्रदर्शन कला – सूफियाना -विद्या शाह जी ने संगीतमय महफ़िल में सूफ़ी और भक्ति संगीत को अत्यंत गरिमापूर्ण
और भावपूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया। विद्या शाह की मधुर और कर्णप्रिय आवाज़ ने खयाल, ठुमरी और सूफ़ी गीतों
को जीवंत कर दिया, जबकि उनके मंचीय संवाद ने दर्शकों को शायरी और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़ा।
तबला और हारमोनियम की समन्वित धुनें, रोशनी और मंच सज्जा ने वातावरण को मंत्रमुग्ध बना दिया, जिससे
श्रोता संगीत में पूरी तरह डूब गए। प्रस्तुत गीतों में अमीर खुसरो की रचनाएँ और सूफ़ी शायरी शामिल थीं, जिन्हें
विद्या शाह ने न केवल गायन बल्कि भाव और कथा के माध्यम से समझाया। कार्यक्रम ने दर्शकों को केवल सुनने
का अनुभव नहीं दिया, बल्कि प्रेम, भक्ति और आत्मिक सान्निध्य की अनुभूति कराई। श्रोताओं की भावपूर्ण प्रतिक्रिया
और तालियों से यह स्पष्ट था कि प्रस्तुति ने सभी पर गहरा प्रभाव डाला। यह न केवल एक संगीत कार्यक्रम था,
बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा थी जिसने सूफ़ी संस्कृति और उसकी गहन भावनाओं को आधुनिक मंच पर जीवंत कर
दिया।
Workshop -The power of Positivity-Aparna Bheecham
अपर्णा बीचम द्वारा आयोजित कार्यशाला की शुरुआत सकारात्मकता के महत्व को समझाने से हुई। उन्होंने छात्रों को
जीवन भर प्रेरित और उत्साहित रहने की सलाह दी। उन्होंने छात्राओं को वास्तविक जीवन के उदाहरण देकर उन्हें
प्रभावित किया। छात्राओं ने इस सत्र में सक्रिय रूप से भाग लिया और माना कि यह कार्यशाला उनके लिए अत्यंत
प्रेरणादायक रही।
Workshop -Poetry Writing – Mahendra Kumar ‘Sani’
कार्यशाला – सुप्रसिद्ध कवि श्री महेंद्र कुमार सानी ने कविता लेखन कार्यशाला का संचालन किया, जिसका उद्देश्य
विद्यार्थियों में साहित्यिक अभिरुचि और सृजनात्मक क्षमता का विकास करना था। श्री सानी ने कविता के मूल
तत्त्व—भाव, भाषा, बिंब, लय और छंद—पर सरल एवं प्रभावी ढंग से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने बताया कि कविता हृदय
की अनुभूतियों की सजीव अभिव्यक्ति होती है और इसे लिखते समय संवेदना को सबसे अधिक महत्त्व देना चाहिए।
कार्यशाला में प्रतिभागियों को तत्क्षण कविता रचना का अभ्यास कराया गया तथा उनकी रचनाओं पर रचनात्मक
सुझाव भी दिए गए। प्रतिभागियों ने इस सत्र को अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक बताया।
स्टैंड अप कॉमेडी -Stand Up Comedy
साहित्य महाकुंभ में आज एक ऐसा कार्यक्रम हुआ, जिसने सभी के चेहरे पर मुस्कान और हँसी की लहर दौड़ा दी।
स्टैंड अप कॉमेडी शो में प्रतिभागियों ने अपनी हास्य प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। मंच पर मौजूद हर प्रतिभागी
ने अपनी अलग शैली और हास्य कौशल से सबका मन मोह लिया। इसी मंच पर विद्यालय के शिक्षक जगत पाल जी
अपनी हास्य प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया।
फेस्टिवल डायरेक्टर श्री अमिताभ भगेल ने समापन समारोह में उपस्थित होकर distinguished वक्ताओं, लेखकों,
कलाकारों और दर्शकों का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी के सक्रिय सहयोग और सहभागिता ने
इस महोत्सव को अभूतपूर्व सफलता दिलाई है। उन्होंने प्रधानाचार्या श्रीमती नैना ढिल्लों के अथक प्रयासों की सराहना
की, जिन्होंने महोत्सव के सभी घटकों को सहजता और कुशलता से एक सूत्र में पिरोया।
फेस्टिवल सलाहकार श्रीमती नैना ढिल्लों और श्री निखिल रुद्र ने भी सभी उपस्थित अतिथियों, प्रतिभागियों और
सहयोगियों के प्रति अपना धन्यवाद व्यक्त किया, जिनके समर्थन और सहभागिता ने जिंदल साहित्य महोत्सव के इस
प्रथम संस्करण को एक ऐतिहासिक सफलता बनाया।


