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शिक्षकों की भूमिका युद्ध में तैनात सैनिकों से कम नहीं : प्रो. जोशी

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शिक्षकों की भूमिका युद्ध में तैनात सैनिकों से कम नहीं : प्रो. जोशी

गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हिसार
शिक्षकों की भूमिका युद्ध में तैनात सैनिकों से कम नहीं  : प्रो. जोशी
मई 18, 2022
आज युवा पीढ़ी को सांचे में ढालना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। युवा विद्यार्थियों का मस्तिष्क गूगलकृत हो गया है। इसलिए ‘गुरु’ ‘गूगल’ दोनों खड़े, काको लागूं पांव, जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। इन हालातों में एक भविष्य निर्माता के रूप में शिक्षकों की भूमिका युद्ध में तैनात सैनिकों से कम नहीं है। उक्त विचार गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार के मानव संसाधन विकास केंद्र द्वारा आयोजित छठ्ठी फैकेल्टी इंडक्शन प्रोग्राम के उद्घाटन सत्र पर दिल्ली अवस्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने व्यक्त किए। प्रो. जोशी आज बतौर मुख्य अतिथि पूरे देश से आभासी माध्यम से जुड़े शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का जिक्र करते हुए प्रो. जोशी ने कहा कि इसकी क्रियान्वयन शिक्षकों के उत्साह, उमंग, जुनून एवं जोश पर निर्भर करता है क्योंकि इसकी हर बिंदु पर प्रत्यक्ष रूप से शिक्षक जुड़े हैं। भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो.जोशी ने कहा कि शिक्षकों का सम्मान सर्वत्र एवं सर्वव्यापी है।  परंतु वे कई बार अधिकार और दौलत की चाहत में अपने कर्तव्य से विमुख होने लगते हैं। यह एक त्रासदी है ।
प्रो. जोशी ने कहा कि शिक्षक को शिक्षा एवं समाज को समग्रता में देखने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि वही युवा पीढ़ी के दिलों दिमाग के पर्दे खोलते हैं। प्रो.जोशी ने कहा कि 2047 में भारत एक ‘बौद्धिक सुपर पावर’ बनने की होड़ में है। क्योंकि अगला विश्व युद्ध न तो अस्त्र से होगा, न तो शस्त्र से होगा और ना ही किसी रासायनिक हथियारों से होगा, बल्कि बुद्धिमता पर ही केंद्रित होगा।
प्रो. जोशी ने खाली गिलास में अमृत भरने का प्रदर्शन करते हुए कहा कि हमें नई ज्ञान की प्राप्ति के लिए पुरानी ज्ञान को असीख (अनलर्न) करना पड़ता है। यह अति आवश्यक है। तभी हमारे ज्ञान रूपी भंडार में नई बातें प्रवेश कर सकेगी। प्रो. जोशी ने युवाओं को सही दिशा व दशा प्रदान करने के लिए शिक्षकों को पांच सी मंत्रों से अवगत कराया ,जो इस प्रकार है – क्रिएटिव (सृजनात्मक), कम्युनिकेटिव (संवादात्मक), कंपैशन (करुणा), कांटेम्पोरेरी (समकालीन) एवं कोऑपरेटिव (सहयोगात्मक)।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेव राज काम्बोज ने अपने संदेश में कहा कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्यवस्था के आधार स्तंभ होते हैं। अत: शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की गुणात्मक क्षमताओं पर निर्भर करती है।  कुलपति ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के आयोजन के लिए विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केंद्र को बधाई एवं सभी सहभागियों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. अवनीश वर्मा ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण से शिक्षकों में वैश्विक दृष्टिकोण विकसित होने के साथ-साथ बढ़ती हुई चुनौतियों का मुकाबला करने की क्षमता भी विकसित हो जाती है। इस प्रशिक्षण से शिक्षकों में एक नई सोच व नई दृष्टि के साथ-साथ एक नया वातावरण भी विकसित होने लगता है जो उनके दायित्वों के निर्वहन में अति प्रभावी सिद्ध होता है ।  प्रो. वर्मा ने शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें आज की बदलती हुई चुनौतियों को एक अवसर के रूप में लेना चाहिए। ऐसा करने से शिक्षक न केवल ज्ञान प्रदाता बनते हैं, बल्कि उच्चतर शिक्षा की नीति निर्धारण में भी अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।
विश्वविद्यालय के जनसंचार के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं मानव संसाधन विकास केंद्र के निदेशक डॉ. मनोज दयाल ने कहा कि इस तरह का प्रशिक्षण नवनियुक्त शिक्षकों के लिए अति उपयोगी व सार्थक होता है। क्योंकि इसमें शिक्षा के विभिन्न आयामों से प्रशिक्षुओं को अवगत कराया जाता है। प्रो. दयाल ने कहा कि चूंकि शिक्षा हमारे अंदर की ईश्वरीय शक्ति को बाहर लाने की एक कला एवं विधा है, इसलिए इसे सार्थक बनाना तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को फलप्रद बनाना हम सभी का परम दायित्व है।
शिक्षा अध्ययन संकाय की अधिष्ठात्री प्रो.वंदना पूनिया ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों को उत्साहित, अभिप्रेरित तथा अनुप्राणित करने का होता है, क्योंकि शिक्षक ही शिक्षा जगत के मेरुदंड हैं। इससे शिक्षकों में सहयोगात्मक कार्य संस्कृति भी विकसित होती है।
कार्यक्रम के संयोजक एवं केंद्र के सहायक प्रोफेसर अनुराग सांगवान ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण से शिक्षकों का चहुमुखी विकास होता है एवं शैक्षणिक स्तरों में एक प्रमाणिकता व नूतनता आती है।

 

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