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लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार के दो अलग-अलग विभागों में तैनात दो चीफ इंजीनियर भ्रष्टाचार कर अवैध संपत्ति पैदा करने के कारण पूरे देश में चर्चा में रहे हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम यादव सिंह का है जो न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण में चीफ इंजीनियर रहते हुए 116 करोड़ के टेंडर निजी कंपनियों को देने के आरोप में खूब चर्चा में रहे. तत्कालीन सरकार ने अपनी मशीनरी का प्रयोग किया और यादव सिंह को सजा मिली. दूसरा नाम यूपीएसआईडीसी के चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा का है, जिन्होंने नियमों कानूनों को ताख पर रखकर अवैध संपत्ति अर्जित की. अरुण मिश्रा को इसी हफ्ते कानपुर के चकेरी में सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार करने के आरोप में एक बार फिर गिरफ्तार किया गया है. दोनों चीफ इंजीनियर की चर्चा पूरे देश में होती हैं.

सरकार ये बचता आ रहा है ये चीफ इंजीनियर
इन सबके बीच प्रदेश सरकार में ही एक चीफ इंजीनियर ऐसा है, जिसके कारनामों का हिसाब करने के लिए प्रदेश सरकार की पूरी मशीनरी लगी हुई है, लेकिन कुछ नहीं कर पा रही है. बड़े-बड़े घोटालों को अंजाम देने के आरोपी इस चीफ इंजीनियर का भ्रष्टाचार यादव सिंह और अरुण मिश्रा से किसी मायने में कमतर नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस चीफ इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई का प्रयास नहीं कर रही हो, लेकिन अपने हाई लेवल कांटैक्ट के दम पर ये चीफ इंजीनियर सरकार की आंखों में धूल झोंककर तीन वर्षों से बचता आ रहा है.

ये है मंडी परिषद का चीफ इंजीनियर जेके सिंह
यादव सिंह और अरुण मिश्रा जैसे देश के बड़े भ्रष्टाचारियों की कतार में खड़ा ये चीफ इंजीनियर कोई और नहीं बल्कि मंडी परिषद का चीफ इंजीनियर जेके सिंह हैं. इसके खिलाफ अब तक आधा दर्जन से अधिक विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों ने जांच और कार्रवाई की मांग कर रखी है. जिसके खिलाफ एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने जांच और कार्रवाई के लिए पत्राचार कर रखा है, जिसके खिलाफ स्वयं विभागीय मंत्री दो-दो बार कार्रवाई की मांग कर चुकी हैं, जिसके खिलाफ उत्तर प्रदेश के दोनों सदनों में जमकर हंगामा होता है, जिसके खिलाफ जवाब देने के लिए प्रदेश के डिप्टी सीएम स्वयं खड़े होते हैं, जिसके खिलाफ विधान परिषद और विधानसभा की दो-दो संवैधानिक समितियां जांच कर रही होती हैं, जिसके कारनामों के खिलाफ प्रदेश सरकार के दो-दो बड़ी तकनीकी संस्थाएं टीएसी जांच कर रही होती हैं, जिसके खिलाफ प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय से भी जांच और कार्रवाई के लिए पत्राचार किया जाता है. वही जेके सिंह प्रदेश सरकार की सभी मशीनरी को धता बताकर 31 अक्टूबर को रिटायर हो रहा है. यही नहीं इस चीफ इंजीनियर का जलवा ये है कि इन सभी पेंडिंग जांचों को दरकिनार कर उसे लगातार हर विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी मिल रहा है, ताकि वो आसानी से रिटायर हो सके.

यादव सिंह और अरुण मिश्रा से भी बड़ा नटवरलाल
31 अक्टूबर को सकुशल रिटायर हो रहे मंडी परिषद के चीफ इंजीनियर जेके सिंह, यादव सिंह और अरुण मिश्रा से भी बड़े नटवरलाल हैं. जेके सिंह पर गाजियाबाद और अन्य कई स्थानों पर मंडी के निर्माण में 200 करोड़ रुपए के सीमेंट घोटाले का आरोप लगा है. ये आरोप देश की आम जनता ने नहीं बल्कि सीतापुर विसवां के विधायक ज्ञान तिवारी, उन्नाव के विधायक पंकज गुप्ता, सिकंदराबाद की विधायक विमला सिंह सोलंकी, सिद्धार्थनगर विधायक श्यामधनी राही, बहुचर्चित लंभुआ विधायक देवमणि द्विवेदी, वाराणसी से एमएलसी और पूर्व कैविनेट मंत्री सतरुद्र प्रकाश जैसे लोगों ने लगाए हैं और अलग-अलग तिथियों में सीएम को पत्र लिखकर जांच और कार्रवाई की मांग कर रखी है.

सदन में दिया था जांच का आश्वासन
यही नहीं वाराणसी से एमएलसी एवं पूर्व कैविनेट मंत्री शतरुद्र प्रकाश ने तो 19 दिसंबर 2017 को बाकायदा विधान परिषद में अल्पसूचित प्रश्न के तहत मुख्यमंत्री के सामने, राज्यमंत्री स्वाति से प्रश्न किया था. उस दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहली बार विधान परिषद के सदन में पहुंचे हुए थे. स्वाति सिंह की तरफ से संतोषजनक जवाब न दे पाने की स्थिति में डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने एमएलसी को 10 दिनों में जेके सिंह के खिलाफ जांच कर कार्रवाई करने का आश्वासन भरे सदन में दिया था. लेकिन, तत्कालीन विधान परिषद के सभापति ने इस मामले को प्रश्न एवं संदर्भ समिति को संदर्भित कर दिया था, संदर्भ समिति में ये मामला अभी भी विचाराधीन है.

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद ने भी लिखा पत्र
अब बात सीएम योगी और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा तक नहीं रही. अब इस मामले में एक नई एंट्री होती है. वो हैं प्रदेश सरकार के दूसरे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या. 26 जुलाई 2018 को केशव मौर्या की तरफ से भी टीएसी जांच को लेकर अपर मुख्य सचिव लोक निर्माण विभाग संजय अग्रवाल की ओर से पत्र लिखा जाता है. आगे बढ़ते ही ये पत्र भी उसी स्थिति में पहुंच जाता है, जिस स्थित में प्रदेश के सीएम और प्रदेश के बड़े-बड़े मंत्रियों और अधिकारियों के की पत्रों की पहुंची.

ठेकेदार ने सीएम को पत्र लिखकर की शिकायत
यहां यह स्पष्ट कर दें कि चीफ इंजीनियर जेके सिंह के खिलाफ जिन योजनाओं में सीमेंट घोटाले की शिकायतें होती रहीं, वो केवल गाजियाबाद मंडी निर्माण प्रकरण नहीं है. दूसरा मामला बुलंदशहर के सिकंदराबाद स्थित मंडी में भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है. यही नहीं बुंदेलखंड के सभी सात जिलों में बनी विशिष्ट मंडी के निर्माण में भी जेके सिंह के हाथ रंगे हुए हैं. विशिष्ट मंडी निर्माण को लेकर भी जांच जारी है. अभी हाल में ही गाजियाबाद एक ठेकेदार ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि महोबा, कन्नौज में बन चुकी मंडियों के क्लियरेंस के लिए चीफ इंजीनियर जेके सिंह की तरफ से 50 लाख रुपए की रिश्वत मांगी जा रही है. इस शिकायत पर तत्काल संज्ञान लेते हुए शासन ने 21 अगस्त को निदेशक मंडी परिषद को पत्र लिखा कि इस आरोप पर तत्काल जांच करा ली जाए. मंडी परिषद ने जांच कराना तो दूर इस शिकायत को भी उसी गर्त में पहुंचा दिया गया, जहां बड़े-बड़ों की शिकायतें पड़ी हुई हैं.

38 करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए
यही नहीं जिलाधिकारी महोबा द्वारा 17 अक्टूबर को निदेशक मंडी को एक पत्र लिखा गया कि उन्होंने मंडी का निरीक्षण किया और मंडी का समस्त कार्य अपूर्ण पाया गया. जिलाधिकारी को शायद ये पता नहीं है कि मंडी का कार्य ढाई साल पहले ही पूरा कर लिया गया है और ठेकेदार द्वारा मंडी परिषद को हस्तगत भी किया जा चुका है. मंडी परिषद ने मंडी निर्माण को लेकर ठेकेदार से संतोष भी जाहिर कर दिया है. आखिर जिलाधिकारी महोबा सत्येंद्र कुमार पूर्ण हो चुके कार्यों को अपूर्ण क्यों बता रहे हैं, जब उस मंडी के निर्माण पर 38 करोड़ रुपए बहा दिया गया. महोबा मंडी के इस खेल में भी इसी नटवरलाल चीफ इंजीनियर जेके सिंह का ही हाथ है. अब इस मंडी को पूर्ण कराने के लिए फिर करोड़ों में बजट बनेगा और फिर शुरू होगा घोटाले का खेल.

आखिर कौन बचा रहा है
चीफ इंजीनियर जेके सिंह के तिलिस्मी समीकरण को लेकर पूरा मंडी परिषद हैरान परेशान है. आखिर कौन है जो जेके सिंह को इस कदर बचा रहा है कि सरकार की पूरी मशीनरी जेके सिंह को छू नहीं पा रही है. वो कौन है जो मुख्यमंत्री, दो-दो उपमुख्यमंत्री, पूर्व मंत्री, विधानसभा और विधान परिषद से भी बढ़कर है. वो कौन है जो दर्जनों की संख्या में जांच जारी रहने के बाद भी जेके सिंह के रिटायरमेंट के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र बनवा रहा है. वो कौन है जिसके निर्देश पर इतने विवादों के बाद भी संयुक्त निदेशक निर्माण से सीधे चीफ इंजीनियर बनवा दिया. वो कौन है जिसके सामने शासन प्रशासन सब बौना पड़ गया है. जाहिर सी बात है जेके सिंह पर किसी न किसी शक्तिशाली का वरदहस्त जरूर है, जो हर बार जेके सिंह को संकट में पड़ने से पहले ही उबार देता है.

अब हुई कार्रवाईयों का विवरण

जनप्रतिनिधियों के पत्र
11 अगस्त 2017 – बिसवां सीतापुर विधायक ज्ञान तिवारी ने गाजियाबाद मंडी के निर्माण को लेकर टीएसी जांच के लिए सीएम को पत्र लिखा.
01 मई-2018 – पंकज गुप्ता, सदर उन्नाव विधायक एवं सभापति स्थानीय निकाय लेखा परीक्षा जांच संबंधी समिति ने भी जांच हुए सीएम को पत्र लिखा.
26 मार्च 2018- बिमला सिंह सोलंकी विधायक सिकंदराबाद बुलंदशहर ने सीएम को चीफ इंजीनियर के पूरे कार्यकाल में हुए कार्यों की टीएसी जांच कराने का अनुरोध किया.
12 फरवरी 2018 श्यामधनी राही, विधायक सिद्धार्थनगर ने पत्र लिखकर नियम-51 के तहत रिपोर्ट मांगी.
12 फरवरी 2018 लंभुआ विधायक देवमणि द्विवेदी ने नियम-51 के तहत जेके सिंह के समस्त प्रभारों को वापस लेने की मांग की थी.
19 दिसंबर 2017 को सपा एमएलसी शतरुद्र प्रकाश ने विधान परिषद में अल्पसूचित प्रश्न में मुख्यमंत्री के समक्ष प्रश्न किया था, जिसका जवाब डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने दिया.
19 दिसंबर 2017 को विधानपरिषद के सभापति रमेश यादव ने विभागीय मंत्री स्वाति सिंह और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा द्वारा संतोषजनक जवाब नहीं देने पर प्रश्न एवं संदर्भ समिति को संदर्भित कर दिया.

आईएएस अफसरों का पत्राचार
4 जून 2018- शुभ्रांत शुक्ल विशेष सचिव मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिव को टीएसी जांच से जुड़े समस्त तथ्य उपलब्ध कराने को कहा.
26-7-2018 को विशेष सचिव पीडब्ल्यूडी ने सीएम और डिप्टी सीएम को टीएसी जांच के अनुमोदन के लिए पत्र भेजा.
26-7-2018 को अपर मुख्य सचिव पीडब्ल्यूडी ने सहमति प्रदान की.
7-8-2018 को मुख्यमंत्री ने टीएसी जांच कराकर कार्रवाई करने की सहमति दी.
16 अक्टूबर 2018 को सीएम की तरफ से सहमति देने के बाद भी कोई कार्रवाई होने पर विशेष सचिव ममता यादव ने रिमाइंडर भेजा.
28 जून 2018 को विभागीय मंत्री स्वाति सिंह ने जेके सिंह को सभी प्रभारों से मुक्त करने का आदेश दिया.
15 जनवरी 2018 को स्वाति सिंह ने चिट्ठी लिखकर जांच होने तक समस्त प्रभार वापस लेने को कहा था.
10 अगस्त 2017 को विशेष सचिव कृषि विपणन ने निदेशक मंडी परिषद को पत्र लिखकर कार्रवाई की बात कही.

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